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Sunday, November 7, 2021
Tuesday, October 26, 2021
Saturday, October 9, 2021
संस्कृत अध्ययन के लाभ , Benifits of Learning Sanskrit
संस्कृत अध्ययन के लाभ
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संस्कृत संस्कार की भाषा -
संस्कृत भाषा के पढ़ने से विद्यार्थियों में संस्कारों का अनायास ही प्रवेश हो जाता है क्योंकि इसमें न केवल भौतिक वस्तुओं संबंधी ज्ञान विज्ञान मौजूद रहता है बल्कि विद्यार्थी को आध्यात्मिक व्यवहारिक ज्ञान भी सीखने को मिलता है |
संस्कृत में आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान -
संस्कृत भाषा में लिखे गए वेदों, उपनिषदों,दर्शनों,आरण्यक ग्रंथों में आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है|
यदि हम वेदों की बात करें तो ऋग्वेद का मंत्र कहता है -
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्व्त्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।। १/१६४/२०
अर्थात् एक वृक्ष पर दो पक्षी सखा भाव से बैठे हैं जिसमें से एक वृक्ष के मधुर फलों का भोग कर रहा है व दूसरा शान्तभाव से उसे चुपचाप देख रहा है | इस मंत्र में पक्षियों के माध्यम से ईश्वर,जीव,प्रकृति का वर्णन किया गया है। जो पक्षी फलों का उपभोग कर रहा है वह जीव है जो पक्षी शांत होकर चुपचाप देख रहा है वह ईश्वर है व वृक्ष प्रकृति रूप है |
इसी प्रकार यजुर्वेद के एक मंत्र में ईश्वर का स्वरूप वर्णन किया गया है
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरम् शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोsर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ४०/८
वेद के इस मंत्र में कहा गया है कि वह ईश्वर सब जगह मौजूद, शुद्ध स्वरूप,काया से रहित है,घाव व नस नाड़ियों के बंधन से रहित है, पाप की वासनाओं से रहित वह ईश्वर वेद रूपी काव्य का रचयिता है। वह मननशील,सर्वत्र व्यापक स्वयं से ही स्वयं का मालिक है अन्य उसके ऊपर कोई का मालिक नहीं है,उसने जैसे पिछली सृष्टि में उसने वेद का ज्ञान दिया था उसी प्रकार है इस सृष्टि में भी वेद का ज्ञान दे रहा है |
उपनिषदों में अध्यात्म विद्या -
ईशावास्योपनिषद के प्रारम्भ में कहा गया है
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
अर्थात इस संसार में जो कुछ भी है वह ईश्वर के द्वारा बसा हुआ है । हे मनुष्य ! तुम संसार की वस्तुओं का त्याग पूर्वक उपभोग करो अन्य किसी के धन का लालच ना करो । इसी प्रकार कठोपनिषद में नचिकेता की कथा आती है जहां पर नचिकेता समस्त सांसारिक प्रलोभनों को छोड़कर केवल ईश्वर की ही प्राप्ति के लिए उत्सुक दिखाई पड़ता है । बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य व गार्गी का आध्यात्मिक विषयों को लेकर के बहुत ही सुंदर चर्चा विचार शास्त्रार्थ होता है |
दर्शनों में आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान - यदि हम दर्शनों की बात करें तो वेदांत दर्शन में ईश्वर के स्वरूप का वर्णन किया गया है । वैशेषिक दर्शन में स्थूल व सूक्ष्म प्रकृति का वर्णन उपलब्ध होता है ।
योग दर्शन में अष्टांग योग अर्थात् यम, नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान,समाधि की प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति ईश्वर की प्राप्ति किस प्रकार कर सकता है इसका विस्तृत वर्णन वहां उपलब्ध होता है । ईश्वर, जीव, प्रकृति के संबंधों की विवेचना सांख्यदर्शन का विषय है । सत्य को किन प्रमाणों के आधार पर तर्क व प्रमाण का प्रयोग करके किस प्रकार जाना जा सकता है इसका विस्तृत व्याख्यान न्यायदर्शन में उपलब्ध होता है ।
व्यवहारिक ज्ञान-विज्ञान -
हमारे शास्त्रों में आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान विज्ञान भी उपलब्ध होता है । संसार में रहकर व्यक्ति को किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए? ब्रह्मचर्य आश्रम में रहते हुए विद्यार्थी ब्रह्मचर्य पालन के साथ-साथ किन किन नियमों का पालन करके विद्याध्ययन को सम्यक् प्रकार से कर सकता है ? अपनी शारीरिक,आत्मिक,मानसिक उन्नति कर सकता है इसका वर्णन मनुस्मृति आदि ग्रंथों में उपलब्ध होता है ।
गृहस्थ आश्रम में रहते हुए गृहस्थी का क्या व्यवहार होना चाहिए ? पति-पत्नी,पिता-पुत्र आदि का आपसी व्यवहार क्या हो ? सगे संबंधियों के साथ किस प्रकार का व्यवहार हो ? समाज,राष्ट्र के साथ किस प्रकार का व्यवहार हो इन सब का वर्णन विस्तार से मनुस्मृति आदि ग्रंथों में विस्तार से ऋषियों ने कर दिया गया है । गृहस्थ आश्रम के बाद वानप्रस्थ आश्रम में रहते हुए व्यक्ति अपनी आत्मिक उन्नति किस प्रकार कर कर सकता है इसका वर्णन उपलब्ध होता है |
इसी ज्ञान के आधार पर प्राचीन काल में हमारे पूर्वज संतान का निर्माण करते थे । महारानी सीता ने वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में रहते हुए लव कुश का निर्माण किया था । रानी मदालसा की कथा हमारे इतिहास में उपलब्ध होती है जिसने इसी संस्कार विज्ञान को जानकर के अपनी इच्छा के अनुसार ऋषि संतानों का निर्माण किया व बाद में राजा के कहने पर राजगद्दी संभालने के लिए राजपुत्र का भी निर्माण किया था । इसके अतिरिक्त भी अनेकों इस प्रकार के उदाहरण हमारे इतिहास में उपलब्ध होते हैं | महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने के द्वारा लिखी गई संस्कार विधि में सोलह संस्कारों का वर्णन किया गया है जिसमें से 15 संस्कार मानव उन्नति के लिए हैं । यह सारा का सारा जीवन निर्माण का साहित्य मनुष्य निर्माण का साहित्य आध्यात्मिक व्यवहारिक ज्ञान ज्ञान से परिपूर्ण साहित्य संस्कृत भाषा में विद्यमान है इससे यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है की संस्कृत भाषा संस्कार की भाषा है । संस्कृत भाषा के पढ़ने से संस्कारों का प्रवेश स्वयमेव व्यक्ति के अंदर हो जाता है उसके लिए अलग से अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं रहती ।
संस्कृत भाषा में भौतिक विज्ञान -
आध्यात्मिक विज्ञान के साथ भौतिक विज्ञान भी हमारे ग्रन्थों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है ।
रोगों के निवारण के लिए आयुर्वेद का ज्ञान विज्ञान चरक,सुश्रुत आदि ग्रंथों में उपलब्ध होता है जिसमें अर्थ क्रिया,शस्त्र,छेदन,भेदन लेपन,चिकित्सा,निदान,औषध,पथ्य,शारीर,देशकाल और वस्तु के गुणों का वर्णन किया गया है ।
अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान के लिए मनुष्य को धनुर्वेद पढ़ना चाहिए जहां पर राजकार्य से लेकर शस्त्र अस्त्र विद्या नाना प्रकार के व्यूहों का अभ्यास,शत्रुओं से लड़ाई के समय क्या किया करनी होती है ? आदि का विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है
इसके अतिरिक्त गान्धर्ववेद जिसको गान विद्या भी कहते हैं उसमें स्वर, राग,रागिनी,समय,ताल,ग्राम,तान,वादित्र,नृत्य,गीत आदि का वर्णन उपलब्ध होता है ।
अर्थवेद जिसको शिल्प विद्या भी कहते हैं में पदार्थ,गुण विज्ञान,क्रिया कौशल नानाविध पदार्थों का निर्माण सम्बन्धी विद्या उपलब्ध होती है ।
ज्योतिष शास्त्र सूर्य सिद्धांत आदि में बीज गणित,अंकगणित,भूगोल,खगोल,भूगर्भ विद्या है ।
कौटिल्य अर्थशास्त्र आदि में अर्थसंबंधी व्यवहारों का विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है ।
इस ज्ञान विज्ञान का प्रयोग हम रामायण,महाभारत आदि ग्रंथों में देखते हैं जहां पर राम लंका में जाने के लिए समुद्र सेतु का निर्माण करते हैं वहीं लंका से अयोध्या तक आने के लिए वह पुष्पक विमान का प्रयोग करते हैं । रामायण महाभारत दोनों कालों में बहुत ही भयानक अस्त्रों का प्रयोग किया गया था जिसमें बड़े पैमाने पर जन हानि हुई । इस प्रकार के अस्त्र-शस्त्र ओं का निर्माण बिना विकसित ज्ञान विज्ञान के संभव नहीं हो सकता । इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारा भौतिक ज्ञान-विज्ञान भी प्राचीन काल में पर्याप्त विकसित था |
संपूर्णता की भाषा -
आधुनिक ज्ञान-विज्ञान केवल भौतिक विषयों की ही जानकारी देता है वहां पर व्यवहारिक या आध्यात्मिक विषयों को या तो पढ़ाया ही नहीं जाता या बहुत छोटे स्तर पर थोड़े से रूप में पढ़ाया जाता है इसलिए उस विद्या से पढ़े हुए आधुनिक लोग भौतिक विज्ञान से तो परिचित होते हैं परंतु व्यवहारिक आध्यात्मिक रूप से उनमें न्यूनता पाई जाती है जबकि संस्कृत भाषा सभी विषयों को परिपूर्ण करती है यहां पर न केवल भौतिक विज्ञान विज्ञान उपलब्ध होता है बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान व्यवहारिक ज्ञान विज्ञान उपलब्ध होता है इसलिए यह संपूर्णता से मनुष्य का निर्माण करती है केवल एक पक्षीय निर्माण नहीं करती ।
वैज्ञानिक व सरल भाषा संस्कृत -
आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसे कंप्यूटर के लिए सबसे उपयोगी भाषा माना है । इस भाषा में प्रत्येक शब्द का वैज्ञानिक विवेचना की जा सकती है जैसे अमुक शब्द की यह प्रकृति है यह प्रत्यय या यह शब्द इस प्रकार बना है तो क्यों बना है जैसे पृथ्वी को पृथ्वी क्यों कहा जाता है ? इस विषय में निरुक्त में लिखा है प्रथनात् पृथ्वी अर्थात् फैली होने के कारण इसे पृथ्वी कहा जाता है।| इसी प्रकार व्रश्चनात् वृक्ष अर्थात् काटा जाने से वृक्ष को वृक्ष कहा जाता है । इस प्रकार विज्ञान सम्मत भाषा होने से ही यह भाषा संसार की सबसे सरल भाषा बन गई क्योंकि जो भाषा जितनी सुव्यवस्थित होती है वह ग्रहण करने में उतनी ही तरल होती है ।
समस्त सुखों की प्राप्ति का मूल कारण
संस्कृत भाषा में उपस्थित ज्ञान विज्ञान को ग्रहण करके उसके अनुसार आचरण करने से मनुष्य अपने समस्त लौकिक पारलौकिक के उद्देश्यों की पूर्ति कर सकता है । यदि व्यक्ति सभी सांसारिक सुखों की सिद्धि करना चाहता है तब भी उसको इस ज्ञान के अनुसार आचरण करना ही होगा और यदि व्यक्ति पारलौकिक अर्थात मोक्ष की सिद्धि करना चाहता है तब भी इस ज्ञान के अनुसार चलना होगा । सभी सुखों की सिद्धि के लिए हमारे प्राचीन शास्त्रों में उपस्थित ज्ञान-विज्ञान व उसके अनुसार आचरण ही एकमात्र उपाय है जिसकी उद्घोषणा यजुर्वेद का यह वचन करता हुआ कहता है
नान्यः पन्था विद्यतेsयनाय । ३१/१८
अर्थात् वेदज्ञानानुसार ईश्वर प्राप्ति के अतिरिक्त सुखों की प्राप्ति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है ।
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